37 लाख लोग बने निशाना, 54 की गई जान; आवारा कुत्तों के काटने का भयावह आंकड़ा

देश में आवारा कुत्तों के काटने की घटनाएं एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का रूप ले चुकी हैं। हालिया आंकड़ों के अनुसार, बीते वर्षों में लगभग 37 लाख लोग कुत्तों के काटने का शिकार हुए हैं, जबकि 54 लोगों की मौत रेबीज जैसी घातक बीमारी के कारण हो चुकी है। इन आंकड़ों ने सरकार, प्रशासन और न्यायपालिका की चिंता बढ़ा दी है। इसी पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट आवारा कुत्तों की समस्या पर सुनवाई कर रहा है, जिसमें विशेष रूप से स्कूलों और अस्पतालों जैसे संवेदनशील स्थानों में उनकी मौजूदगी को लेकर सवाल उठाए गए हैं।

सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह तथ्य रखा गया कि बच्चों, बुजुर्गों और मरीजों पर कुत्तों के हमले लगातार बढ़ रहे हैं। कई राज्यों से आई रिपोर्ट्स में सामने आया है कि स्कूलों के आसपास और अस्पताल परिसरों में आवारा कुत्तों के झुंड देखे जा रहे हैं, जिससे आम लोगों में भय का माहौल है। विशेषज्ञों का कहना है कि रेबीज एक जानलेवा बीमारी है, और समय पर इलाज न मिलने पर यह लगभग हमेशा घातक साबित होती है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, कुत्तों के काटने के मामलों में हर साल इजाफा हो रहा है, लेकिन इसके मुकाबले टीकाकरण, नसबंदी और पुनर्वास कार्यक्रमों की रफ्तार धीमी है। नगर निगमों और स्थानीय निकायों पर जिम्मेदारी होने के बावजूद जमीनी स्तर पर ठोस कार्रवाई नहीं दिख रही। कई जगहों पर कुत्तों की नसबंदी योजनाएं कागजों तक सीमित रह गई हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र और राज्यों से जवाब मांगा है कि स्कूलों और अस्पतालों को सुरक्षित बनाने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। अदालत ने यह भी संकेत दिया है कि मानव जीवन की सुरक्षा सर्वोपरि है और किसी भी तरह की लापरवाही को स्वीकार नहीं किया जा सकता। अब सबकी निगाहें इस पर टिकी हैं कि सरकार और प्रशासन इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए कौन से प्रभावी और व्यावहारिक कदम उठाते हैं।

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