ईरान एक बार फिर गंभीर राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक संकट के दौर से गुजर रहा है। सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की सत्ता को लेकर सवाल पहले से ज्यादा तेज हो गए हैं। महंगाई, बेरोजगारी, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध, युवाओं का असंतोष और धार्मिक शासन से बढ़ता मोहभंग ईरान की स्थिरता पर सीधा असर डाल रहे हैं। ऐसे में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि क्या ईरान भविष्य में टुकड़ों में बंट सकता है।
ईरान की अर्थव्यवस्था वर्षों से अमेरिकी और पश्चिमी प्रतिबंधों के दबाव में है। तेल निर्यात सीमित होने, विदेशी निवेश घटने और मुद्रा रियाल की लगातार गिरती कीमत ने आम जनता की कमर तोड़ दी है। रोजमर्रा की जरूरतों की चीजें आम लोगों की पहुंच से बाहर होती जा रही हैं। इससे जनाक्रोश बढ़ा है, जो समय-समय पर सड़कों पर विरोध प्रदर्शनों के रूप में सामने आता रहा है।
सामाजिक स्तर पर भी ईरान में गहरी बेचैनी देखी जा रही है। देश की बड़ी आबादी युवा है, जो इंटरनेट, वैश्विक संस्कृति और आधुनिक जीवनशैली से जुड़ी हुई है। ये युवा सख्त धार्मिक कानूनों, अभिव्यक्ति की आज़ादी पर पाबंदियों और नैतिक पुलिस जैसी व्यवस्थाओं से नाराज हैं। महसा अमीनी की मौत के बाद हुए व्यापक विरोध प्रदर्शनों ने यह साफ कर दिया कि धार्मिक शासन के खिलाफ असंतोष अब केवल सीमित वर्ग तक नहीं रहा।
राजनीतिक मोर्चे पर सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण भी एक बड़ी समस्या बन चुका है। रिवोल्यूशनरी गार्ड्स की बढ़ती भूमिका, विपक्षी आवाज़ों का दमन और चुनावी प्रक्रिया पर सवाल लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर करते हैं। खामेनेई की उम्र और उत्तराधिकारी को लेकर अनिश्चितता ने भी सत्ता संघर्ष की आशंकाओं को जन्म दिया है।
इसके अलावा, ईरान की जातीय और क्षेत्रीय विविधता भी चिंता का विषय है। कुर्द, बलूच, अरब और अज़रबैजानी समुदाय लंबे समय से भेदभाव और उपेक्षा के आरोप लगाते रहे हैं। अगर केंद्र सरकार कमजोर होती है, तो ये क्षेत्र अधिक स्वायत्तता या अलगाव की मांग को और तेज कर सकते हैं, जिससे देश के बिखरने का खतरा बढ़ सकता है।
हालांकि, यह भी सच है कि ईरान की राज्य संरचना अभी पूरी तरह ढही नहीं है। सुरक्षा बल, प्रशासनिक तंत्र और राष्ट्रवादी भावना अब भी शासन को संभाले हुए हैं। लेकिन अगर मौजूदा संकट गहराता गया और सुधार की ठोस पहल नहीं हुई, तो खामेनेई की सत्ता के भविष्य और ईरान की एकता पर सवाल और गंभीर होते जाएंगे।
















