सुप्रीम कोर्ट ने किशोरों को यौन अपराधों से संरक्षण कानून यानी पॉक्सो एक्ट के दुरुपयोग से बचाने के लिए क्रांतिकारी तैयारी में है. सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को केंद्र सरकार सुझाव दिया.उसने कहा कि वह पॉक्सो कानून के तहत किशोरों के बीच आपसी सहमति से बने वास्तविक संबंधों को कानूनी कार्रवाई की कठोरता से बचाने के लिए एक रोमियो जूलियट क्लॉज शामिल करने पर विचार करे. कोर्ट का कहना है इस के प्रावधान से उन किशोरों को बचाया जा सकेगा, जो नासमझी में आपसी सहमति से रिश्ते बनाते हैं.
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि इस कानून का बार-बार दुरुपयोग होते देखा गया है. अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि जहां एक तरफ यह कानून बच्चों की सुरक्षा के लिए है. हालांकि, कई मौकों पर देखा गया है कि इसका इस्तेमाल बदला लेने या निजी हिसाब चुकता करने के लिए किया जाता है, तो न्याय की अवधारणा ही धूमिल हो जाती है. सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में एक फैसले की प्रति भारत सरकार के कानून सचिव को भेजने का निर्देश दिया है ताकि इस खतरे को रोकने के लिए जरूरी कदम उठाए जा सकें.
क्या है रोमियो जूलियट क्लॉज
सुप्रीम कोर्ट ने जिस रोमियो जूलियट क्लॉज का सुझाव दिया है. उसका मुख्य उद्देश्य वास्तविक किशोर संबंधों को पॉक्सो की कठोर धाराओं से मुक्त रखना है. अक्सर देखा गया है कि किशोरों के बीच आपसी सहमति से बने रिश्तों में परिवारों द्वारा विरोध होने पर लड़के के खिलाफ पॉक्सो के तहत मामला दर्ज करा दिया जाता है. चूंकि, पॉक्सो में सहमति का कोई स्थान नहीं है और पीड़ित की उम्र 18 साल से कम होने पर आरोपी को गंभीर जेल की सजा भुगतनी पड़ती है. इसलिए, अदालत चाहती है कि कानून में ऐसा तंत्र हो जो यह पहचान सके कि कौन से मामले वास्तव में अपराध हैं और कौन से मामले महज किशोर उम्र के आपसी लगाव के हैं.
इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट ने पलटा
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक पुराने आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर आया है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक आरोपी को जमानत देते समय निर्देश दिया था कि पॉक्सो के हर मामले में पुलिस को शुरु में ही पीड़ित का मेडिकल कराना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के इस निर्देश को अधिकार क्षेत्र से बाहर बताते हुए रद्द कर दिया है. शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत के चरण में हाई कोर्ट अनिवार्य जांच प्रोटोकॉल जारी नहीं कर सकता और न ही मिनी ट्रायल आयोजित कर सकता है.
उम्र निर्धारण केवल ट्रायल का विषय है, जमानत का नहीं
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक पीठ ने अपने फैसले में यह साफ कर दिया कि पीड़ित की उम्र का निर्धारण ट्रायल यानी मुकदमे की सुनवाई का विषय है न कि जमानत देने के लिए. जस्टिस करोल द्वारा दिए गए फैसले में कहा गया कि अगर उम्र पर सवाल उठाया जाता है तो जमानत देने वाली अदालत केवल पेश किए गए दस्तावेजों की जांच कर सकती है. हालांकि, उसे उन दस्तावेजों की सत्यता पर फैसला नहीं देने का अधिकार नहीं है. अदालत ने कहा कि मेडिकल सबूत न्याय के मार्ग में एक निष्पक्ष गवाह का काम करते हैं.
















